सलाखों के पीछे से

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भारत के राष्ट्रीय जागरण काल के जिन व्यक्तित्वों की तुलना, ऐतिहासिक सीमा-सापेक्षता को ध्यान में रखते हुए, फ्रांसीसी प्रबोधन के निर्भीक विचारकों से, अथवा बेलिंस्की, हर्ज़न, चेर्निशेव्स्की जैसे रूस के क्रान्तिकारी जनवादी दार्शनिक लेखकों से की जा सकती है, उनमें गणेशशंकर विद्यार्थी का नाम सबसे आगे की पंक्तियों में आता है। विद्यार्थी जी का पत्र ‘प्रताप’ ब्रिटिश साम्राज्यावाद-विरोधी राष्ट्रीय पत्रकारिता की अग्रिम पंक्ति में तो था ही, इसने प्रखर राष्ट्रवादी पत्रकारों तथा क्रान्तिकारियों की पूरी पीढ़ी को प्रशिक्षित करने में भी भूमिका निभायी। भगतसिंह ने भी कानपुर में रहते हुए कई महीनों तक ‘प्रताप’ में काम किया था। अपने निर्भीक…

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