तुम्हारी क्षय

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राहुल सांकृत्यायन सच्चे अर्थों में जनता के लेखक थे। वह आज जैसे कथित प्रगतिशील लेखकों सरीखे नहीं थे जो जनता के जीवन और संघर्षों से अलग-थलग अपने-अपने नेह-नीड़ों में बैठे कागज पर रौशनाई फिराया करते हैं। जनता के संघर्षों का मोर्चा हो या सामन्तों-ज़मींदारों के शोषण-उत्पीड़न के खि़लाफ़ किसानों की लड़ाई का मोर्चा, वह हमेशा अगली कतारों में रहे। अनेक बार जेल गये। यातनाएँ झेलीं। ज़मींदारों के गुर्गों ने उनके ऊपर कातिलाना हमला भी किया, लेकिन आज़ादी, बराबरी और इन्सानी स्वाभिमान के लिए न तो वह कभी संघर्ष से पीछे हटे और न ही उनकी कलम रुकी। दुनिया की छब्बीस…

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