संस्मृतियाँ

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1947 की आधी-अधूरी आज़ादी के बाद सत्ताधारियों की तमाम कोशिशों के बावजूद न तो क्रान्तिकारी शहीदों की याद को भुलाया जा सका और न ही उनके विचारों को झूठे प्रचार और उपेक्षा के नीचे दफ़न किया जा सका। इतिहास की किताबों में उन्हें भले ही जगह नहीं मिली या दो-चार पैराग्राफ़ में पूरे आन्दोलन को समेट दिया गया हो, लेकिन जनता के दिलों में वे ही राज करते रहे हैं। हँसते-हँसते मौत का सामना करने वाले इन नौजवान क्रान्तिकारियों का जीवन भी बेहद दिलचस्प और प्रेरक था। लगातार कठिनाइयों और जोखिम के बीच रहकर क्रान्तिकारी काम करने और रास्ता तलाशने…

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