पाठान्तर

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लगभग चार दशकों से विष्णु खरे हिन्दी कविता की दुनिया में जड़ीभूत काव्य संस्कारों वाले पाठकों के लिए एक चुनौती के रूप में और शाश्वत काव्य-प्रतिमानों के आग्रही आलोचकों के सामने एक असुविधा के रूप में उपस्थित हैं। विष्णु खरे की कविता उनका अपना आविष्कार है। विष्णु खरे की कविता जीवन और सृजन के उद्गम स्थलों की खोज और उनके क्षितिज-विस्तार के उपक्रमों को एक चुनौती के रूप में स्वीकार करती है और अपने पाठकों की संवेदना और विवेक के समक्ष स्वयं एक चुनौती के रूप में प्रस्तुत होती है। यह उद्विग्नता-विकलता से पैदा होती है और उद्विग्नता-विकलता पैदा करती…

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