ईश्वर को मोक्ष

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नीलाभ नदी पर झिलमिलाती छायाओं, पारभासी मरीचिकाओं, जादुई अमूर्तनों, तिलिस्मी रूपकों और कुहरिल बिम्ब-विधानों के कवि नहीं हैं। उनके रचनाकर्म की प्रकृति ठोस है — वहाँ चीज़ें तमाम मिथ्याभासों और रहस्यावरणों से मुक्त होकर अपने आयतन, भार, रंग और गन्ध के साथ सामने आती हैं। वे नितान्त निजी अनुभवों को सार्वभौम तक और सार्वभौम को नितान्त निजी अनुभव तक लेकर जाते हैं। वस्तुगतकरण और आभ्यन्तरीकरण की प्रक्रियाएँ उनकी कविताओं में साथ-साथ मौजूद मिलती हैं। उनमें सुकोमलता के तत्व भी मिलते हैं और साहसिकता के भी। इलाहाबादी फक्कड़पन और पंजाबी बेलौस रोमैण्टिसिज़्म के विचित्र मेल के साथ उनकी जीवन-दृष्टि कविताओं से…

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