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इक्कीसवीं सदी में भारत का मज़दूर आन्दोलन
यह पुस्तक 26-28 जुलाई को गोरखपुर में हुई दूसरी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी जिसका विषय था ‘इक्कीसवीं सदी में भारत का मज़दूर आन्दोलन निरन्तरता और परिवर्तन, दिशा और सम्भावनाएँ, समस्याएँ और चुनौतियाँ’, में पढ़े गये चार आलेखों का संकलन है। यह एक निर्विवाद तथ्य है कि गत शताब्दी के विशेषकर अन्तिम दो दशकों के दौरान, विश्व पूँजीवाद की कार्य-प्रणाली एवं ढाँचे में, साम्राज्यवादी दुनिया के आपसी समीकरणों और राजनीतिक परिदृश्य में, राष्ट्रपारीय निगमों के चरित्र और राष्ट्रराज्यों की भूमिका में तथा अधिशेष निचोड़ने के तौर-तरीक़ों में अहम बदलाव आये हैं। इन बदलावों का बुनियादी कारण पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली की आन्तरिक गतिकी…
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