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इच्छा की दूब
मलय का पिछला संकलन ‘देखते न देखते’ 2007 में आया था। और अब बिना किसी पुनरुक्ति-दोष के, बिना किसी प्रकार के बिम्ब-संकुचन के, मुक्तिबोधीय लीक पर ‘दुर्निवार आत्मसम्भवा परम अभिव्यक्ति’ की खोज करते हुए प्रस्तुत संकलन ‘इच्छा की दूब’ में अपनी कविताओं का एक नया लोक लेकर मलय एक बार फिर हमारे सामने उपस्थित हैं।
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