मार्क्सवाद और भाषाविज्ञान की समस्याएँ

20.00

पाँचवे दशक के अन्त में ‘प्राव्दा’ में सोवियत भाषा-वैज्ञानिकों के बीच एक लम्बी बहस चली थी जिसका समाहार करते हुए स्तालिन ने 1950 में अपना ऐतिहासिक, सारगर्भित लेख ‘भाषाविज्ञान में मार्क्सवाद के बारे में’ लिखा था। उस लेख के साथ ही सोवियत छात्रों द्वारा पूछे गये प्रश्नों के उत्तरों और कुछ पत्रों को शामिल करके तीन वर्ष बाद यह पुस्तिका प्रकाशित हुई। यूँ तो यह पुस्तिका कठमुल्लावादी मार्क्सवादी भाषा-चिन्तन के विरुद्ध केन्द्रित है, लेकिन भाषा-विज्ञान के बुनियादी प्रश्नों पर मार्क्सवादी पहुँच-पद्धति को स्पष्ट करने के साथ ही यह प्रत्ययवादी, प्रत्यक्षवादी और रूपवादी भाषा-चिन्तन के विरुद्ध अकाट्य तर्क प्रस्तुत करती है।…

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