अनश्वर हैं सर्वहारा संघर्षों की अग्निशिखाएँ

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यह निबन्ध हिन्दी पत्रिका ‘दायित्वबोध’ के मई-जून 1992 के अंक में प्रकाशित हुआ था। राहुल फ़ाउण्डेशन से पुस्तिका के रूप में 1995 में इसे प्रकाशित किया गया और तब से इसके कई संस्करण निकल चुके हैं। दो वर्ष पूर्व इसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी प्रकाशित हो चुका है। सर्वहारा क्रान्ति की फ़िलहाली हार, पूँजीवादी पुनर्स्थापना, विपर्यय और गतिरोध के वर्तमान विश्व ऐतिहासिक दौर का विश्लेषण करते हुए इसमें विश्व सर्वहारा आन्दोलन की इतिहास-विकास यात्रा पर एक विहंगम दृष्टि डाली गयी है और इसके समाहार के आधार पर क्रान्तियों के भविष्य के बारे में कुछ सम्भावनाएँ, कुछ विचार प्रस्तुत किये गये हैं।…

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