मज़दूर बिगुल – दिसंबर 2016

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सम्पादकीय मेहनतकश जन-जीवन पर पूँजी के चतुर्दिक हमलों के बीच गुज़रा एक और साल अर्थनीति : राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय नोटबन्‍दी – जनता की गाढ़ी कमाई से सरमायेदारों की तिजोरियाँ भरने का बन्दोबस्त / मुकेश त्‍यागी नोटबन्दी और बैंकों के ‘‘बुरे क़र्ज़’’ / श्‍वेता श्रम कानून सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘समान काम के लिए समान वेतन’ का फ़ैसला लेकिन देश की बहुसंख्यक मज़दूर आबादी को इससे हासिल होगा क्या? / शिवानी फासीवाद / साम्‍प्रदायिकता फासीवाद की बुनियादी समझ बनायें और आगे बढ़कर अपनी ज़िम्मेदारी निभायें / कविता कृष्णपल्लवी भाजपा के सत्ता में आने के बाद से अल्पसंख्यकों व दलितों के ख़ि‍लाफ़़ अपराधों की रफ़्तार…