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जाति प्रश्न के समाधान के लिए बुद्ध काफी नहीं, अंबेडकर भी काफी नहीं, मार्क्स जरूरी हैं
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किसी भी सिद्धान्त की एकमात्र प्रासंगिकता सामाजिक व्यवहार का पथ-प्रदर्शन करने में निहित होती है। किसी भी सामाजिक चिन्तक का चिन्तन वैज्ञानिक और इतिहास-सम्मत है या नहीं और वह सामाजिक मुक्ति का यथार्थवादी मार्ग सुझाता है या नहीं – यही सबसे बुनियादी प्रश्न है। किसी भी चिन्तक या नेता के विचारों को अन्धभक्तिपूर्ण भावुकता के बजाय वैज्ञानिक कसौटियों पर परखा जाना चाहिए, उनमें से सही चीज़ों को ग्रहण किया जाना चाहिए और ग़लत चीज़ों की आलोचना करके उनका परित्याग किया जाना चाहिए। यह श्रद्धा या अश्रद्धा का प्रश्न नहीं है। यह किसी नेता या विचारक की नीयत पर उंगली उठाने का…
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