समान की तलाश

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एक लंबे अंतराल के बाद असद अपने नये संग्रह में कई ऐसी कविताओं के साथ उपस्थित हैं जो बेरहमी से बदलते हुए हमारे वक़्त का आईना हैं, जिनमें इंसानियत की शिकस्त की आवाज़ है और इस सब पर एक गंभीर बौद्धिक प्रतिक्रिया भी है। पिछले दो दशकों में हमारे समाज के बाहरी और भीतरी जीवन में जो कुछ टूटा और नष्ट हुआ है, असद उसे एक ऐसे व्यक्ति की तरह देखते-पढ़ते हैं जिसकी ‘परेशानी खुद ही अपना चश्मा ढूँढ ले आती हो’। ‘सामान की तलाश’ में 1857 पर लिखी गयी वह बेजोड़ कविता है ही जिसने हिंदी की बौद्धिक दुनिया…

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